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शहीद सरदार भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त


हमारी देश की आजादी के लिए बहुत सारी कुर्बानियां दी गई है और तब जाकर हमें आज यह आजादी मिली है लेकिन इस आजादी के पीछे बहुत सारे लोगों का खून बहा है बहुत सारे लोगों के घर बेघर हुए वह देश के प्रति जज्बा था जो उन लोगों के रगों में दौड़ता था कि देश के लिए मर मिटना है देश के लिए उन्हीं लोगों ने जान गवा दी जो गुलाम बनकर नहीं रहना चाहते थे बहुत सारे क्रांतिकारी उस वक्त मार दिए गए लेकिन कुछ क्रांतिकारी ऐसे बने जिनके नाम से ही हर कतरा कतरा आजादी की तरफ बढ़ने लगा ऊन मे से एक क्रांतिकारी का नाम था शहीद भगत सिंह वह भगत सिंह जिसने 23 साल की उम्र में अपने गले में देश के लिए फांसी का फंदा लगाया भगतसिंग वो लाडका जो अपनी २३ साल कि उमर मे देश के लिये हस्ते हस्ते फासी चड गया

सरदार भगत सिंह जन्म 28 सितंबर 1970 पंजाब जिले के रायपुर में  गांव है वहां पर हुआ था भगत सिंह के मातापिता का नाम विद्यावती कौर और सरदार किशन सिंह था भगत सिंह 14 वर्ष के उम्र में ही पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं में काम करने लगे देश की आजादी के संघर्ष में ऐसे रमे की पूरा जीवन ही देश को समर्पित किया जब उनके शादी की तैयारियां चल रही थी उस वक्त वह अपने घर से भाग गए थे फिर वह देश के संघर्ष में ऐसे रमे कि उन्होंने पूरा जीवन देश के लिए त्याग दिया अमृतसर में हुए जालियनवाला हत्याकांड ने उन्हें गहरा आघात लगा उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ कर भारत के आजादी संघर्ष के लिए नौजवान भारत सभा नाम की स्थापना की भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में जुड़ गए 17 नवंबर 1928 को लाला लाजपत राय की मौत हो गई उन में साइमन गो बैक के नारे लगाने गए थे वहां पर भगत सिंह भी शामिल थे उन्होंने लाला लाजपत राय के खून का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस रहे अंग्रेज अधिकारी सांडर्स को मार डाला 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ वह हमसे मिले हुए बम असेंबली मे खाली स्थान पर एक ही फेंका गया था जहां पर से किसी को भी नुकसान ना पहुंचे इस बम का फेंकना यही था कि हम किसी को हानि नहीं पहुंचाना चाहते लेकिन हमारी आवाज आवाम तक पोहचनी चाहिए.

भगत सिंह इसका नेतृत्व उन्होंने खुद किया और बटुकेश्वर भी थे और उन्होंने इसी के साथ अपने आप को गिरफ्तार भी करवाया तभी एक आवाज निकली थी कि बहरों को सुनने के लिए धमाके की आवाज होती है भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा में फांसी की सजा हुई उसकी तारीख 24 मार्च तय की गई गई थी भगत सिंह के नाम पर देश में जुनून इतना बढ़ चुका था  सरकार को 24 तारीख से पहले ही राजगुरु सुखदेव और भगतसिंह को फांसी दी गई और उनका शव जलाया गया भगत सिंह फांसी पर जाते वक्त यह गाना गुनगुना रहे थे मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे बसंती चोला आवाज रंग दे तू मोहे रंग दे आवाज रंग दे बसंती चोला भगत सिंह एक नास्तिक भी थे वह मरते-मरते किताब पढ़ रहे थे उनका मानना यह था. कि मैं एक मानव हूं और और जीन बातो से मुजमे प्रेरणा अति है मे उसासे प्रभावित होता हू

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Amol Kambale is founder "India-mirror" he has an interested in job news blog and entertainment topics and whatsoever his passion dedication

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